“कैलाश-मनसरोवर” : धार्मिक व साहसिक यात्रा का अनूठा संगम

Raj-Shekhar-Bhatt-3राज शेखर भट्ट

देवभूमि उत्तराखण्ड में पग-पग पर नैसर्गिक सौन्दर्य से ओत-प्रोत पर्यटन स्थल हैं तो अलौकिक विश्व प्रसिद्ध आराध्यस्थलों की लम्बी श्रृंखला भी यहीं है। इसी प्रदेश से होकर तिब्बत तक पहुंचते हैं कैलाश-मानसरोवर यात्री। इस यात्रा पथ पर पड़ते हैं आठ पड़ाव। यह यात्रा 22 दिनों में पूर्ण होती है। इस यात्रा में यात्रियों की देखभाल का जिम्मा उठाना पड़ता है कुमाऊं मण्डल विकास निगम को, जो कि प्रदेश सरकार का एक उपक्रम है। इस वर्ष यह यात्रा 22 जून से शुरू होगी। पवित्र कैलाश-मनसरोवर यात्रा जीवन  को सम्पूर्णतः रोमांचित करने वाली, श्रद्धा व विश्वास को भरने वाली प्रकृति के पूर्ण तत्व को हृदय में समाहित करने वाली अनूठी यात्रा है। इस यात्रा के श्रद्धालु यात्रियों को बिना चिकित्सकीय परीक्षण के नहीं भेजा जाता। यात्रा का संचालन भारत का विदेश मंत्रालय करता है। इस यात्रा के बारे में कहा जा सकता है कि यह धार्मिक व साहसिक यात्रा का अनूठा संगम है।

kailash_mansarowar4कैलाश-मनसरोवर यात्रा के बारे में एक पुरानी बात बतातें हैं। लगभग 1600 वर्ष पूर्व रचित स्कन्ध पुराण के मानस खण्ड में इस यात्रा का उल्लेख आता है। इस पुराण में, यात्रा मार्ग यात्रा के लाभ इत्यादि का भी उल्लेख है। आज कैलाश का सम्पूर्ण क्षेत्र तिब्बत (चीन-स्वीकृत) की सीमा के अन्तर्गत आता है लेकिन प्रागैतिहासिक काल से ही कैलाश-मनसरोवर की यात्रा हिन्दू धर्म की पवित्रतम यात्राओं में से एक मानी जाती रही है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल में महाभारत के पश्चात पाण्डवों ने माता कुंती और द्रोपदी के साथ कैलाश मानसरोवर की यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान ही पाण्डवों ने बद्रीनाथ व केदारनाथ जाने की योजना बनाई थी। महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पाण्डव सबसे पहले कैलाश-मनसरोवर की यात्रा पर आए और इस यात्रा को पूर्ण करके ही बद्री-केदार की यात्रा पर गए थे। बताया जाता है कि मानसरोवर से तकलाकोट और वहां से लिपुलेख दर्रे को पार करते हुए कुंती बीमार हो गयी। कालापानी के पश्चात नाभीढांग में स्थानीय लोगों ने पाण्डवों को बताया कि गुंजी गांव में व्यास ऋषि का आश्रम है, जहां कुन्ती को चिकित्सा सहायता प्राप्त हो सकती है। युधिष्ठिर के आदेश पर भीम व्यास ऋषि के आश्रम पहुंचे, जहां उन्हें महर्षि व्यास मिले और उन्होंने भीम को दवाईयां दी, जिससे कुन्ती ठीक हो गयी। इसके बाद पाण्डव ‘कुटी’ गांव आए जहां कुन्ती फिर अस्वस्थ हो गयी। जिस स्थान पर कुन्ती ने अपना शरीर त्यागा, उस स्थान को कुन्ती पार्वत के नाम से जाना जाता है। स्थानीय भाषा, संस्ड्डति व परम्परा के अनुसार सत्य की देवी के रूप में ‘कुन्ती आमा’ की मान्यता आज भी बनी हुयी है। स्थानीय लोग ‘कुन्ती आमा’ की शपथ लेते हैं तो कतई झूठ नहीं बोलते।

kailash_mansarowar3हम आपको दर्शन करा रहे हैं कैलाश मानसरोवर के। कैलाश मानसरोवर वही पवित्र जगह है, जिसे शिव का धाम माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर शिव-शंभु का धाम है। यही वह पावन जगह है, जहाँ शिव-शंभु विराजते हैं। मानसरोवर झील 320 किमी क्षेत्र में फैली है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत एवं पश्चिम में रक्ष तल झील है। यह समुद्र तल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी परिमिति लगभग 88 किमी तथा औसत गहराई 90 मीटर है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है जो प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलहटी में कल्पवृक्ष लगा माना गया है, जिसे हिन्दू धर्म में पवित्र माना गया है। बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बी भी मानसरोवर को पवित्र धाम मानते हैं। कैलाश पर्वत, 22,028 फीट ऊँचा एक पत्थर का पिरामिड है। जिस पर सालभर बर्फ की सफेद चादर लिपटी रहती है। हर साल कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करने, शिव-शंभु की आराधना करने, हजारों साधु-संत, श्रद्धालु, दार्शनिक यहाँ एकत्रित होते हैं, जिससे इस स्थान की पवित्रता और महत्ता काफी बढ़ जाती है। हिन्दू विचारधारा के अनुसार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुयी थी। मान सरोवर शब्द संस्कृत भाषा के मानष व सरोवर को मिलाकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ है मन का का सरोवर। यहां देवी का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उनका रूप मानकर पूजा जाता है। यह एक शक्ति पीठ है।

मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलहटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है। कैलाश मानसरोवर को बौद्ध धर्म में पवित्र माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि रानी माया को भगवान बुद्ध की पहचान यहीं हुयी थी। जैन धर्म व तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोग भी मानसरोवर पवित्र मानते हैं। झील के तट पर कई मठ भी हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के कर कमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहाँ प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर, धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। यह स्थान बौद्ध धर्मावलंबियों के सभी तीर्थ स्थानों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान के अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है। वह बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ की संज्ञा भी देते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है। वहीं जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ने भी यहीं निर्वाण लिया। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहाँ ध्यान किया था। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। प्राचीनकाल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोककथाएँ केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं, जो है सभी धर्मों की एकता।  ऐसा माना जाता है कि महाराज मान्धाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं, जिसे हिन्दू धर्मावलम्बी कल्पवृक्ष कहते हैं।

kailash_mansarowar1इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा आगामी 12 जून से शुरू हो नहीं है। कुंमाऊ मण्डल निगम ने यात्रा की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। आदि काल से चल रही इस यात्रा की सही तिथि का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन यह यात्रा आदिकाल से चलती रही है। वर्ष 1962-65 में भारत-चीन सम्बन्धों में आये तनाव के चलते यह यात्रा 1967 तक बंद थी। वर्ष 1967 के बाद यह धार्मिक यात्रा पुनः शुरू हुयी। वर्ष 1981 में इस यात्रा में केवल तीन दल भेजे गये, जिसमें 59 यात्री थे। वर्ष 1983 से 1999 तक कैलाश मानसरोवर यात्रा में सात दल भेजे जाने लगे। वर्ष 2000 से प्रतिवर्ष 16 दल भेजे जा रहे हैं। गत वर्ष सर्वाधिक 774 श्रद्धालुओं ने पवित्र कैलाश मानसरोवर के दर्शन किये। वर्ष 1981 से अब तक 366 दलों के माध्यम से 12558 श्रद्धालुओं को पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने का मौका मिला है।

इस बार की इस धार्मिक यात्रा को सफल बनाने के लिए कुंमाऊ मण्डल विकास निगम ने सभी तैयारियां पूर्ण कर ली हैं। काठगोदाम, धारचूला, सिरखा, गाला, बूंदी, गुंजी, कालापानी, नाभीढांग में पड़ाव निश्चित कर वहां सभी तैयारियां को अंजाम दे दिया गया है। यदि मौसम ने साथ दिया तो यह यात्रा निर्बाध ढंग से चलेगी। यात्रियों के लिए भोजन, दवायें व अन्य सुविधओं की व्यवस्था कर ली गयी हैं। यह मात्रा 12 जून से सितम्बर माह तक चलेगी। एक यात्रा दल को पवित्र मानसरोवर की परिक्रमा करने में 22 दिन का समय लगता है। कुल मिलाकर देखा जाये तो यह यात्रा एक अविस्मरणीय यात्रा है। जिसका पूरा संचालन भारत सरकार करती है और देख-रेख प्रदेश सरकार का एक उपक्रम कुमाऊं मण्डल विकास निगम।


शिव का धाम कैलाश-मानसरोवर

इस स्थान तक पहुँचने के लिए कुछ विशेष तथ्यों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे इसकी ऊँचाई 3500 मीटर से भी अधिक है। यहाँ पर ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे सिरदर्द, साँस लेने में तकलीफ आदि परेशानियाँ प्रारंभ हो सकती हैं। इन परेशानियों की वजह शरीर को नए वातावरण का प्रभावित करना है।


भारत से मानस कैलाश कैसे पहुँचें?
  • भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। यहाँ तक पहुँचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहाँ के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  • वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुँचकर वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है।
  • कैलाश तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुँचकर, वहाँ से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुँचा जा सकता है। मानसरोवर तक पहुँचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।
  • काठमांडू से लहासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहाँ से तिब्बत के विभिन्न कस्बों – शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुँचकर मानसरोवर जा सकते हैं।

अस्कोट बने यात्रा पड़ाव

kailash_mansarowar2आगामी 12 जून बुधवार से पवित्र कैलास मानसरोवर यात्रा शुरू हो रही है। एक बार फिर हिमालयी परिक्षेत्र में बम-बम भोले की गूंज रहेगी। आज यात्रा में शामिल होने वालों को शायद ही मालूम हो कि सदियों पहले कैलास मानसरोवर का संचालन कत्यूरी राजवंशी अस्कोट रियासत के पाल राजा करते थे। तब पाल राजा ही पास जारी करते थे। राजवंश के पास मौजूद दस्तावेजों में राजा मैसूर ड्डष्ण चंद्र वाडियार, फिल्म अदाकार प्रेम नाथ, प्रख्यात संत नारायण स्वामी की कैलास यात्रा के वृतांत हैं।

अस्कोट रियासत (1279.1967) के पहले राजा कत्यूर राजवंश के अभय पाल देव हुए। अंतिम राजा टिकेंद्र बहादुर पाल के नेतृत्व में 11 नवम्बर 1967 तक रियासत का अस्तित्व रहा। वर्ष 2000 में पाल रियासत पाल रियासत के अंतिम राजा टिकेंद्र बहादुर पाल की भी मृत्यु हो गयी। पाल राजवंश के दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1938 तक कैलास यात्रा का संचालन अस्कोट रियासत करती थी। राजा के वहां से यात्रा पास जारी होता था। यात्रियों के यात्रा खर्च के रूप में पचास रूपये लिये जाते थे। संतों से कोई कर नहीं लिया जाता था। यात्रा के दौरान भोजन, आवास सुरक्षा की जिम्मेदारी रियासत उठाती थी।

मैसूर के राजा कृष्ण चंद्र वाडियार ने वर्ष 1931 में कैलास यात्रा की थी। रियासत से 75 जत्था राजा मैसूर की सुरक्षा में भेजा गया था। यात्रा संपन्न होने के बाद मैसूर ने नवंबर 1931 को अस्कोट रियासत के तत्कालीन राजा विक्रम बहादुर चंद को पत्र भेज कर आभार जताया था। 1938 में हिंदी सिनेमा के दमदार अदाकार प्रेम नाथ और प्रसिद्ध संत नारायण स्वामी की यात्रा का वृतांत है। 1938 में राजा विक्रम पाल की मृत्यु के समय युवराज टिकेंद्र बहादुर पाल की उम्र मात्र छह वर्ष होने के कारण राजकाज अंग्रेजों के अधीन चला गया। कैलास मानसरोवर यात्रा संचालन का काम क्षेत्र सेंट्रल कमेटी अल्मोडा को दे दिया गया। वर्ष 1954 में टिकेंद्र बहादुर पाल के बाद एक बार फिर यात्रा संचालन का काम पाल राजवंश करने लगा। 1962 की चीन लड़ाई के बाद यात्रा बंद हो गई। 1967 में रियासत भारत में विलय हो गयी। वर्ष 1981 में यात्रा पुनः शुरू हुई। यात्रा के बदले स्वरूप में अब पाल राजवंश के वारिस कुंवर भानुराज पाल 14 वीं वाहिनी आईटीबीपी मिर्थी में पहले दल के स्वागत में होनें वाले समारोह में मुख्य अतिथि होते हैं। पाल राजवंश की ऐतिहासिक वस्तुएं यात्रा अवधि तक आईटीबीपी मुख्यालय में यात्रियों के अवलोकनार्थ रखी जाती है।