कहानी : रिश्ते

सलीम रज़ा

रोज-रोज की कलह और भूख से तंग आकर अपनी प्रेगनेंट पत्नी को लेकर शैलेश नौकरी की तलाश में गांव से शहर में आ गया। दो दिन की भूख-प्यास से पति-पत्नी बेहाल हो चुके थे। रेलवे स्टेशन के मुसाफिर खाने में दोनों बैठे हुये थे कि अचानक पत्नी को पेट में दर्द की शिकायत हुई। शैलेश अपनी पत्नी को शहर के सरकारी अस्पताल में ले गया। डाक्टर ने बताया कि प्रसव का समय करीब है इन्हें भर्ती कर दो। अस्पताल में पत्नी को दाखिल करके शैलेश महफूज हो गया, इसके दो कारण थे एक तो अस्पताल से मिलने वाला खाना और दूसरा सोने के लिये आसरा।

अस्पताल से निकलकर शैलेश ने अपनी नौकरी की तलाश शुरू कर दी, लेकिन अनजान शहर में हर कोई उससे अपनी गारन्टी देने की बात करता। यहीं पर आकर शैलेश निरूत्तर हो जाता। इसी जदद्ोजहद में शाम को शैलेश अपनी पत्नी के पास अस्पताल पहुंच गया। अस्पताल में पत्नी ने कहा, ‘‘आपको डाक्टर ने बुलाया है।’’ एक अनजानी आशंका से ग्रस्त शैलेश डाक्टर के पास पहुंचा। शैलेश को डाक्टर ने देखते ही कहा, ‘‘सुनयना के साथ हो क्या?’’ शैलेश ने ‘हां’ में सिर हिलाया।

डाक्टर ने शैलेश को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। शैलेश के बैठते ही डाक्टर ने कहा, ‘‘क्या तुम अपनी पत्नी के खान-पान का ख्याल नहीं रखते या पत्नी सिर्फ तुम्हारे लिये संभोग के असीम आनंद का जरिया है या बच्चे पैदा करने की मशीन। तुम्हें मालूम है सुनयना का हेमोग्लोबिन कितना कम है, उसे 3 यूनिट खून चढ़ाना पड़ेगा। तुम्हें इसका बाहर से इंतजाम करना पड़ेगा और मैं कुछ दवा और इंजेक्शन लिख रही हूं, बाहर मेडिकल स्टोर से ले लेना।’’ शैलेश बोला, ‘‘वो डाक्टर साहब।’’ अपनी बात पूरी कर पाता कि डाक्टर बोली, ‘‘तुम तो पढ़े-लिखे हो, जानते हो सरकारी अस्पतालों की हालत कितनी खराब है, हम भी क्या करें मजबूर हैं। जाओ जल्दी खून और दवाओं का इन्तजाम करो, नहीं तो जच्चा-बच्चा को खतरा हो सकता है।’’

शैलेश बाहर आ गया लेकिन अपनी जेब को देखकर बाहर पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगा। उसकी आंखें लाल हो रही थीं। शिफ्ट बदलने का समय हो गया, अपनी शिफ्ट खत्म करके डाक्टर बाहर आई तभी उनकी निगाह पेड़ के नीचे बैठे शैलेश पर पड़ी। ऐ… ऐ… कहकर डाक्टर ने शैलेश को आवाज दी। शैलेश डाक्टर को देखकर घबरा गया, हिम्मत करके पास गया तो डाक्टर उस पर बरस पड़ीं। शैलेश सिर झुकाये खड़ा रहा, काफी देर बाद भी जब शैलेश ने सिर उपर नहीं उठाया तो डाक्टर टैम्पर होती हुई बोली, ‘‘तुम बहुत बड़े मक्कार हो, मेरी बात का असर ही नहीं हो रहा है। अगर भगवान ना करे तुम्हारी पत्नी के साथ कुछ अनर्थ हो गया तो कफन का इन्तजाम कैसे करोगे।’’ उसने सिर उपर उठाया तो जार-कतार रोने से उसकीं आंखे सूज चुकी थीं। डाक्टर सयंत होते हुये बोली, ‘‘बात क्या है।’’ अब शैलेश के सब्र की सीमा खत्म हो चुकी थी, उसका घुट-घुट कर रोना तेज़ सिसकियों में बदल गया।

डाक्टर शैलेश के करीब आकर बोलीं, ‘‘क्या बात है मुझे बताओ।’’ शैलेश को लेकर डाक्टर स्टाफ रूम की तरफ चली गई। थोड़ा रिलेक्स होने के बाद शैलेश ने बताया कि सुनयना से उसने दोनों परिवारों की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह किया था। घर आने के बाद किसी ने सुनयना को ना तो बहू और ना ही परिवार के सदस्य के तौर पर जोड़ा। मेरी बेरोजगारी ही सबसे बड़ा कारण बनी थी। रोज-रोज़ की कलह और उपवास के चलते मैं अपनी पत्नी को इस शहर में लेकर चला आया। मैं शिक्षित हूं, एम.ए अर्थशास्त्र से किया है, कई विभागों में नौकरी के लिए अप्लाई किया है तो कुछ जगह लिखित परीक्षा पास करने के बाद धनाभाव में साक्षात्कार क्लीयर नहीं कर पाया।

ऐसे हालात में प्राईवेट नौकरी का ही विकल्प मेरे पास बचा है, लेकिन प्राईवेट नौकरी के लिये इस शहर में सब मेरी गारन्टी मांग रहे हैं। पैसे मेरे पास हैं नहीं, फिर दवा और खून का इंतजाम मैं कैसे और कहां से करूं? शैलेश की बात सुनकर डाक्टर भी अपने अतीत में खो गई। उन्हें भी अपने प्रेम विवाह और पुराने दिनों के किये गये संघर्ष और कलह की याद ताजा हो गई। शैलेश के कन्धे पर हाथ रखकर डाक्टर बोली शैलेश खून के रिश्तों की ही अहमियत हो ये ज़रूरी नहीं, मुंह बनाये रिश्ते इन खून के रिश्तों के मुकाबले कहीं ज्यादा अडिग और कहीं ज्यादा दमदार होते हैं। परेशान ना हो भईया, मैं कैसी हूं, मैं सुनयना के लिये सारा इंतजाम करूंगी। शैलेश तुम मेरे साथ घर चलना आखिर कितने सालों से प्यार, अपनापन, और स्नेह भरा शब्द ‘बुआ‘ सुनने के लिये मेरे कान तरस रहे हैं और हां अब इस शहर में तुम्हें गारन्टी देने की कोई ज़रूरत नहीं।