कब तक भरते रहेंगे उम्मीद के कुएं में भरोसे का पानी

kuaanप्रेमचंद की एक चर्चित कहानी है ठाकुर का कुआं । इस मर्मस्पर्शी कहानी में आजादी के पूर्व देश में अंग्रेजों के राज में फलती  फूलती महाजनी सभ्यता के साथ उस समय की विपन्नता और गांव की दुर्दशा का चित्रण कर समाज को जागरुक किया गया है। कहानी का नायक एक दलित है जो बीमार है। उसे पानी पिलाने आधी रात को दबे पांव उसकी जोरु ठाकुर के कुआं से पानी लाने जाती है। मगर ठाकुर के डर के कारण जब वह वापस लौटती है तब तक उसका पति लोटे में रखा प्रदूषित पानी पीकर मर चुका रहता है। विडंबना देखिए कि इसके करीबन एक सदी बाद फिर एक प्यासी दलित गरीब मेहनश महिला प्रदेश के मुखिया से अपने गांव की प्यास बुझाने कुआं मांग रही है..। ठीक वैसे ही जैसे शबरी ने श्रद्धाभाव से भगवान  राम से जूठे बेर के बदले उनकी भक्ति मांगी थी।

संयोग से मुख्य मंत्री रमन सिंह भी ठाकुर हैं, मगर वे  प्रेमचंद की   तरह कोई जमींदार नहीं बल्कि प्रदेश के मुखिया हैं जो चिलचिलाती धूप में उदारमना होकर गांव गांव देने निकले हैं। ग्राम सुराज अभियान शिविर में छत्तीसगढ़ के गौरेला के गौरखेड़ा पहुंचे रमन सिंह ने चौपाल के बाद काम कर रही मजदूरन महिला उर्मिला कोर्राम के टिफिन से  बड़े मनुहार से भात,चटनी और भाजी खाया। साथी महिला मानवती से मांग कर चीफ सेक्रेटरी विवेक ढांढ  के साथ  तेंदू भी  खाया ।  इसके बाद वरदानी अंदाज में जब दोनों से पूछा कि आप लोगों को क्या चाहिए तो दोनों ग्रामीण महिलाओं ने बड़ी दीनता,उम्मीद और मासूमियत से कहा हमें कुआं चाहिए..। प्रदेश के मुखिया ने तथास्तु  की शैली में भरोसा दिलाते हुए कहा जल्द ही आप लोगों की  पानी की समस्या दूर होगी। राज्य के  मुखिया का यह किस्सा सुर्खियों में है । होना भी चाहिए, जब सूरज का पारा सातवें आसमान पर है और वे बांटने निकले है तथा ग्रामीण तपते झुलसते उम्मीद में मांगने निकले हैं। मगर विडंबना  देखिए कि पूरी एक शताब्दी बाद भी देश की दारुण स्थिति  नहीं बदली है।

ग्रामीण प्यासे हैं गांव का हलक सूख रहा है। लोग शराब से हलक तर कर रहे हैं । सैकड़ों गांव में अस्पताल है तो डांक्टर और दवाई नहींं । सड़क है तो पुल नही, और खेत है तो सरकारी इमदाद नहीं । छापेमारी के बाद बाद अफसर गुलाबी हो रहे हैं और सियासतमंद फूल फूल रहे हैं । राज्य में सुराजे लाने निकले  देश के तेजी से विकास करते राज्य के मुख्यमंत्री का कुआं देना बड़ी बात नहीं बल्कि गरीब और  दोनों ग्रामीणं महिलाओं द्वारा उनसे गांव के लिए कुआं मांगना बड़ी बात है। उसने कुआं मांग कर प्रदेश के मुखिया को बता दिया कि आप हकीकत में कहां खड़े  हैं। गागर में सागर की तरह इस प्रश्न में यह तथ्य भी समाहित है कि क्या सोलह सालों में जितना विकास  होना चाहिए था हुआ और क्या बजट की सौ फीसदी राशि पूरी ईमानदारी से विकास पर खर्च की गई ? सूखे कंठ के  यह हालात स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद हैं। यदि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के सोलह साल बाद भी राजधानी से लगे बिलासपुर के गांव में प्यास बुझाने एक अदद कुआं या मुकम्मल पेयजल व्यवस्था नहीं हो पाई है तो यह यहां अब तक काबिज विकास का दावा करने वाले भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकार के लिए सोचनीय ही नहीं बल्कि पानी पानी होने वाली बात है।

जब पेंड्रा के गौरेला का यह हाल है तो फिर बस्तर सरगुजा का सहज अंदाज लगाया जा सकता है। राज्य में सरगुजा,बस्तर और दुर्ग सहित कई जिलों बहुतेरे गावों में हजारों लोगों को शुद्ध पेयजल सुलभ  नहीं हैं।एक तरफ हजारों ग्रामीण लाल पानी और झिरिया का प्रदूषित पानी पीने अभिशप्त हैं वहीं दूसरी ओर नवधनाड्य तबका बिस्लरी पी रहा है और अपने मल्टीस्टोरी फ्लैटे में स्वीमिंग पूल में जलक्रीड़ा कर रहा है क्या यही है गांधी ग्राम स्वराज भाजपा का रामराज । यह स्थिति गांव गरीब और किसान के  विकास  का नारा देकर तेरह साल से सत्तारुढ़ रमन सरकार की कथनी और करनी के फर्क को बखूबी बयां करती है। सबका साथ सबका विकास के लोकलुभावन जुमले की कितनी सच्चाई  है इसका सबसे बड़ा प्रमाण इस लोक सुराज शिविर में आए 28 लाख आवेदन हैं जिनमें प्रदेशवासियों ने अपनी बुनियादी और गांव,कस्बे और शहर घर की समस्याओं के निदान की गुहार की है। पानी बिजली, स्वास्थ्य, पुल, पुलिया, नौकरी, खेती किसानी, कर्ज, मकान, एनओसी, पंचायत, निगम और  जनदर्शन,मंत्रालय मे उनकी इसी तरह समस्याओं की महीनों से पड़ी अर्जियां उस विकास की जमीनी हकीकत बता रही हैं जो सरकार, नुमाइंदे और मीडिया दावा करता है।

28 सौ शिविर में 28 लाख जनसमस्याओं के आवेदन महज इसी साल नहीं बल्कि इनका सिलसिला कांग्रेस शासन काल में अर्जुन सिंह के समय से चला आ रहा है। समस्याएं सुरसा के मुंह की तरह उसी तरह बढ़ रही हैं जिस तरह भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। विकास की तमाम योजनाएं भ्रष्टाचार की पर्याय बन कर रह गई हैं। लोकशाही की नौकरशाही पर चढ़ी लालफीताशाही की केंचुली की मजबूरी समस्याओं के  निपटान में  नहीं बल्कि इन्हें बनाए रखने में है। ऐसे ही ग्राम सुराज शिविर में 4 साल पहले तत्कालीन कलेक्टर बस्तर के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का नक्सलियों द्वारा अपहरण का बहुचर्चित मामला हुआ था। बाद में इसका खुलासा करते हुए उन्होंने मीडिया में बयान दिया था कि दूसरे दिन शिविर में सीएम के सामने जिले के भ्रष्ट अफसरों के घोटाले की पोल खुलने वाली थी। मगर अचानक एक दिन पहले उनका अपहरण  हो गया? यक्ष प्रश्न यह है कि जब राज्य में सरकार अपने बयानराग के अनुसार ईमानदारी से चहुंमुखी विकास कर रही है, राज्य मांडल बन गया है, यहां सुशासन है तो फिर इस तरह के ग्राम या लोकसुराज अभियान में सभी महकमों से संबंधित समस्याओं का पहड़ा क्योंकर ऊंचा होता जा रहा है ? वह भी हर साल इसी तरह ।

यानी इनके समाधान के दावे चुनावी वादों की तरह खोखले हैं। इसका सूबत यह है कि तेरह सालों में खुद रमन सिंह की सैकड़ों घोषणाएं अब तक पूरी नहीं हो पाई हैं । उन्होंने कुआं देने जैसे ठेरों वादे हर साल किए, अफसरों को पूरा करने भी कहा होगा  मगर उन्होंने इन्हें संजीदगी से लेना जरुरी नहीं समझा। यही हाल अजीत जोगी, दिगविजय सिंह और उनके पहले मोतीलाल वोरा व अर्जुन सिंह का रहा। दरअसल व्यवस्था की हालत हमने नहीं देख हमने नहंी सुना जैसी हो गई है। दफ्तरों की कुर्सियां गूंगी बहरी ही नहीं बल्कि पैरालाइज्ड हो गई हैं । सत्ता के नुमाइंदों को बस वोट बैंक से सत्ता हासिल कर इसे महफूज रखने में ही रुचि है विकास  में नहीं। सियासतमंद अफसर गठजोड़ बस जनधर्म नहीं धनधर्म में यकीन करता है। अब साल दर साल होने वाले लोक सुराज शिविर एक राजनीतिक सरकारी फिलर और रस्मअदायगी तक महदूद होकर रह गए हैं।

यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार पूरी गंभीरता से एक-एक आवेदन का समयसीमा में निपटान करती । उसे 42 डिग्री में उबलते आने वाले फरियादियों की परेशानी का पूरी संवेदना से अहसास होता। इसके रस्मी हो जाने का जनता को अब बखूबी अहसास हो चला है, यही वजह है कि वह शिविर को संजीदगी को नहीं लेती। सोलह सालों में ही यदि ऐसे शिविरों की समीक्षा की  जाए तो असलियत सामने आ जाएगी कि कितने लाखों लाख आवेदन नौकरशाही  ने कूड़ेदान में डाल  दिए। वर्ष 1999 में सीएम जोगी दुर्ग के सिलघट ग्राम पहुंच  ग्रामीओं की मांग पर पैठू में एनिकट बनाने का वादा किया था जो अब तक नहीं बना । यदि सरकार,शासन और प्रशासन कर्मठ, संवेदनशील और ईमानदार रहे तो समस्याएं चुटकी बजाते निपट जाती हैं ।

विकास का घोड़ा भी सरपट भागता है । मगर ऐसा तो इस राज्य क्या पूरे देश में कहीं दिखता नहीं है। विकास के बजट के बंटरबांट को जब तक खत्म नहीं किया जाए विकास महज एक सियासी जुमला ही बना रहेगा और जनता ऐसे ही मृगमरीचिका की तरह  त्राहिमाम त्राहिमाम कहते रहेगी। कड़वी सचाई तो यह है कि करोड़ों का जितना बजट और संसाधन ऐसे बुहप्रचारित निरर्थक अभियान में खर्च किया जाता है यदि गंभीरता से सुशासन दिखे तो इसकी जरुरत ही नहीं है। मगर चूंकि सरकारी मिशनरी ढर्रे पर चल रही है और सत्तारुढ़ दल को अपना वोट बैंक पुख्ता करना है सो इस तरह के प्रोपोगंडा के जलसे उनके मजबूरी बन गए  हैं ।
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