व्यंग्य : हिंदी हमारी मॉम है…

ललित शौर्य

हिंदी हमारी मॉम है। हिंदी हमारी मॉम है। वी लाइक हिंदी। वी लव हिंदी। बच्चे हिंदी दिवस पर जोर -जोर से चिल्ला रहे हैं। बच्चों के साथ आज वो टीचर भी जोर-जोर से शोर कर रहे हैं जो विद्यालय परिसर में हिंदी बोलने पर बच्चों पर फाइन पेल दिया करते हैं। उनके मुख से भी हिंगलिश में अनेक शब्द झर रहे हैं। हमें हिंदी डे सेलिब्रेट करना चाहिए। हिंदी में ही सबका भला है। एवरीवन रेस्पेक्ट हिंदी। ना जाने क्या -क्या बोले जा रहे हैं।आज उनका हिंदी प्रेम उमड़-घुमड़ रहा है। हिंदी उनके अंदर से फूट रही है। मानो कोई फाउंटेन हो। हिंदी दिवस आते ही वो पुरानी हिंदी की किताबों से धूल पोछकर उसमें से कबीर और रहीमके दोहे रटने लगते हैं ताकि मंचों से उन्हें बोला जा सके। ये अनेक अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की एवं कान्वेंट स्कूलों की हकीकत है। वहीँ दूसरी ओर अनेक सरकारी विभाग हिंदी दिवस पर हिंदी का तर्पण करते नजर आते हैं। हिंदी पखवाड़े के नाम पर आये बजट को बिना डकार लिए हजम किया जाता है।

हिंदी पखवाड़ा और हिंदी दिवस दुर्भाग्य से पितृ पक्ष में पड़ता है। कई विभाग तो हिंदी भाषा को पितृ भाषा समझकर उसका श्राद्ध कर देते हैं। बैंक में जो बाबू या अधिकारी आज हिंदी दिवस पर बड़े बड़े भाषण पेल रहे हैं वो निकासी या जमा पर्ची को हिंदी में भरने पर नाक -मुंह सिकोड़ने लगते हैं। वो उस ग्राहक का स्टेटस पहले ही आक लेते हैं। उन्हें लगता है ये कोई कम पढ़ा लिखा गवार किस्म का व्यक्ति होगा। दुर्भाग्य से आज हिंदी के हितों की रक्षा का काम कथित कम पढ़े लिखे व्यक्ति , या ग्रामीण परिवेश के लोग ही कर रहे हैं।

शहरी और हाई प्रोफाइल लोग इंग्लिश या हिंगलिश में अपनी बातें करते हैं। उन्हें हिंदी में बोलने वाला व्यक्ति लो प्रोफ़ाइल या अनपढ़ लगता है। हिंदी को बचाने की कवायद एक सितंबर से 14 सितम्बर तक सरकार द्वारा एवं विभिन्न विभागों द्वारा की जाती है। भाषण पेलकर, स्मृति चिन्ह शॉल सम्मान भेंट कर, माथे पर कुछ मिनटों तक बल उत्पन्न कर हिंदी बचाने का सामुहिक प्रयास किया जाता है। नेताजी भी हिंदी पखवाड़े पर बतौर मुख्यातिथि माला पहनकर, मंच पर रखी काजू, किशमिश, जूस, शर्बत लपेटकर खूब हिंदी बचाते हैं। अपने उद्बोधन में अंग्रेजी में कुछ रटी -रटाई पंक्तियाँ बोलकर हिंदी बचाने का आह्वाहन करते हैं।

हिंदी आज स्वरुप बदल रही है। वो हिंग्लिश हुई जा रहे है। आज बच्चे टट्टी नहीं करते बल्कि पोट्टी करते हैं। आज लोग नहाते नहीं बल्कि बाथ करते हैं। आज धन्यवाद शब्द नहीं सुनाई देता बल्कि सब थैंक्स करते हैं। सॉरी का शोर रोज हमारे कानों में दर्द करता है। आज कोई रोता नहीं बल्कि वीप करता है, गहरा सोचता नहीं बल्कि थिंक डीप करता है, सोता नहीं बल्कि स्लीप करता है। हम हिंदी के हाड़ों पर नर्तन कर हिंदी दिवस मना रहे हैं। और हाँ मनाएं क्यों नहीं। हिंदी कोई ऐरी -गैरी लैंग्वेज थोड़े ही है। उससे हमारा प्राउड जुड़ा हुवा है। हम हिंदी की रक्षा करके रहेंगे। भले ही अंग्रेजी में करे वो बात दूसरी है। क्योंकि हिंदी हमारी मॉम है…