हाय रे! अंतरात्मा

ललित शौर्य

हम केवल गले से ही आवाज नहीं निकालते। मतलब की आवाज का प्रोडक्शन केवल गले से ही नहीं होता। बल्कि कही और से भी होता है। पर वहाँ से आवाज कभी -कभी आती है। इस आवाज को अन्तरात्मा की आवाज कहते हैं। कुछ लोगों में इस शब्द में आत्मा शब्द जुड़ा होने से भय व्याप्त हो सकता है। और वो मुझ पर भय का माहौल पैदा करने का आरोप लगा सकते हैं। पर मैं क्लियर कर दूँ , अन्तरात्मा का आत्मा वात्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये अन्तरात्मा की आवाज जीते-जीते हमारे अंदर से निकल सकती है। इसे केवल वही सुन सकता है जिसके अंदर से ये आवाज निकल रही हो।

उसके बाद वो बंदा माइक पर या प्रेस कॉन्फ्रेंस कर औरो को बताता है कि उसकी अन्तरात्मा ने उससे क्या बात कही। प्रायः अन्तरात्मा की आवाज सामान्य या आम आदमियों के अंदर से कम निकलती है।या निकलती भी है तो उसे दुनिया नहीं सुनती। वो आवाज केवल उसकी जुबान में ही सिमट कर रह जाती है। अन्तरात्मा का प्रचलन राजनीति में ज्यादा है। देश के राजनीतिज्ञो की अन्तरात्मा ज्यादा हिलोरे मारती है। समय-समय पर नेताओ को उनकी अन्तरात्मा की आवाज सुनाई देती है। खासकर चुनाव के समय या चुनाव की आहट होते ही अन्तरात्मा की आवाज सुनाई देने की सम्भावना बढ़ जाती है। नेताजी अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर अपनी पार्टी बदलते हैं, अपने सुर बदलते हैं, अपनी लय और ताल भी अन्तरात्मा की आवाज सुनकर ही बदलते हैं। लोग बेचारे नेताजी को कोसते रहते हैं कि वो दलबदलू हैं, एहसान फरामोश हैं, ये हैं वो हैं पर उन्हें कौन समझाए नेताजी तो अन्तरात्मा की आवाज सुनकर बेवफा हुए हैं। भला कोई भी नेता अपनी अन्तरात्मा से कैसे बेवफाई कर सकता है।

पार्टी से बेवफाई हो सकती है, जनता से बेवफाई हो सकती है पर अन्तरात्मा से बेवफाई किसी भी हालत में नहीं हो सकती। अन्तरात्मा ही तो है जो नैय्या को डूबने से बचाती है, बाकी जीवन में नैय्या पार लगाती है। वर्तमान राजनीति में अन्तरात्मा का ट्रेंड चालू है। उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, गुजरात से लेकर बिहार तक अन्तरात्मा की आवाज ने खलबली मचाई हुई है। नेता अन्तरात्मा की आवाज पर गठबंधन तोड़ रहे हैं ,पार्टी छोड़ रहे हैं, पार्टी में तोड़-फोड़ मचा रहे हैं। कोई राजनीति की सुचिता की दुहाई दे रहा है, कोई लोकतंत्र के पीलर दरकने की बात कर रहा है। पर सबसे बड़ी बात अन्तरात्मा की है।

जिसके सामने सभी बातें बौनी साबित हो रही हैं। पर एक बात सोचने वाली है, ये अन्तरात्मा हमेशा नेताजी के कान में पार्टी बदलने, पार्टी छोड़ने, गठबंधन तोड़ने की बात ही क्यों कहती है। नेताजी की अन्तरात्मा कभी सामाजिक सुधार, गरीबों का उद्धार, रोटी,बिजली,पानी की सुव्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा, बेरोजगारों को रोजगार, सीमाओं की रक्षा, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट में अंकुश लगाने की बात क्यों नहीं कहती । ये अन्तरात्मा भी अपने भले की आवाज लगाती है। ये आवाज भी सत्तालोलुप है। इसे भी मलाई चाहिए। ये भी ऐश और कैश उड़ाना चाहती है। हाय रे! अन्तरात्मा कभी कोई भली आवाज भी तो नेताजी जी को लगा। जिससे गरीबों का भला हो सके।