लोकपर्व हरेला व प्रकृति का है अनूठा संबंध

भुवन बिष्ट, रानीखेत (अल्मोड़ा)

देवभूमि उत्तराखण्ड में लोकपर्वो का अपना एक विशेष महत्व है, लोकपर्वो का प्रकृति से अनूठा संबध तो होता ही है इसके साथ साथ इन पर्वो का आध्यात्मिक , वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विशेष महत्व होता है, इन पर्वो में एक है देवभूमि का लोकपर्व हरेला | सावन मास की कर्क संक्राति को हरेला पर्व के रूप में मनाया जाता है, हरेला पर्व सुख समृद्धि और धन्य धान्य का प्रतिक भी है | ऐसी मान्यता हरेले के संबध में प्रचलित है कि जितना अच्छा हरेला उगेगा, फसल भी उतनी ही अच्छी होगी | हरेले का पर्व हमें नई ऋतु के शुरू होने की सूचना देता है, वर्षा ऋतु का आरम्भ सावन माह से होती है इसलिए एक गते श्रावण को हरेला का पर्व मनाया जाता है | भारत भूमि के साथ साथ हमारी देवभूमि उत्तराखण्ड भी कृषि प्रधान है अतः हरेला का संबध हरियाली और फसलों से भी रहा है |

हरेला शब्द का संबध हरियाली से भी है, हरेले के पर्व में नौ दिन पहले घर के भीतर स्थित मंदिर व गांव के सामूहिक मंदिर में सात प्रकार के अन्न जिनमें ( गेहूं , जौं, मक्का गहत, सरसों, ) को रिगांल की टोकरी अथवा लकड़ी के चाक में बोया जाता है | हरेला बोने के लिए एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया को भी अपनाया जाता है | इसके लिए पहले टोकरी में एक परत मिट्टी की बिछायी जाती है फिर इसमें बीज डाले जाते हैं, इसके बाद फिर मिट्टी डाली जाती है और फिर से बीज डाले जाते हैं यही प्रक्रिया पांच बार अपनायी जाती है |

हरेले को सूर्य की रोशनी से बचाया जाता है इसे दस दिन तक प्रकाश रहित जगह पर बड़े श्रद्धाभाव से रखा जाता है, सूर्य की रोशनी न मिलने से इसका रंग वासंती (पीला) हो जाता है जिसे शुभ माना जाता है , नौंवे दिन हरेले की स्थानीय फल के वृक्ष की टहनी से गुड़ाई की जाती है और फिर दशवे दिन हरेले को काटा जाता है, काटने के बाद हरेले को तिलक चंदन और अक्षत से मंत्रित ( रोग शोक निवारणार्थ , प्राण भक्षक वनस्पते , इदा गच्छा नमस्तेषु, हर देवो नमस्तुते) किया जाता है | इस कार्य को हरेला पतीसना (पतेसना) भी कहा जाता है, इसके बाद इसे सबसे पहले देवताओं को चढ़ाया जाता है, इसके बाद घर की बुजुर्ग महिला सभी सदस्यों , बच्चों को हरेला लगाती हैं हरेला लगाने का अर्थ यह है कि सबसे पहले घुटने फिर कंधे, और अंत में सिर में रखा जाता है, और मंगलमयी कामनाओं व आशिर्वाद के रूप में कही जाती हैं ये पॉक्तियां……

जी रये जागि रये,
धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये,
सूर्य जस तारण , स्याव जस बुद्धि है जो,
दुब जस हरि रयीये,
सिल पिसि भात खाये , जांठि टेकि झांड़ जाये,

(अर्थात हरियाली तुझे सदैव मिलती रहे , जितते रहना विजयी रहना, जागरूक रहना, पृथ्वी के समान धैर्यवान व आकाश के समान फैले हुये प्रशस्त, उदार बनना, सूर्य के समान तप व सियार के समान बुद्धि, दुब की तरह सदैव हरियाली अथवा उन्नति हो, दिर्घायु हो, )

इसके बाद परिवार के सभी लोग साथ में बैठकर घर के पकवान खाते हैं | हरेले के दिन घर में बने उड़द के दाल के बड़े व पुवे व खीर बनाई जाती है | हरेला अच्छी कृषि का भी सूचक माना जाता है | हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को कोई नुकसान न हो और फसलों की पैदावार अच्छी हो | हरेला पर्व का नई. दुल्हनों को विशेष रूप से इंतजार रहता है, विवाह के बाद प्रथम हरेले के त्यौहार पर दुल्हन अपने मायके जाती हैं और वहां पर दुल्हा दुल्हन को हरेला लगाया जाता है, इससे उनके सुखी वैवाहिक जीवन व दिर्घायु जीवन की कामना की जाती है | हरेला का प्रकृति से अनूठा संबध है|

श्रावण मास के हरेले के दिन शिव पार्वती की मूर्तियां भी गढ़ी जाती हैं, शुद्ध मिट्टी की आकृतियों को प्राकृतिक रंगों से शिव परिवार की प्रतिमाओं का आकार दिया जाता है, और इस दिन पूजा की जाती है | गांवों के मंदिरों में श्रावण मास के हरेले से ही बाइस दिनों तक होने वाली साधना बैसी का आयोजन भी किया जाता है | हरेले से प्रकृति में हरियाली छाने लगती है, हरेला और प्रकृति का सदैव ही अनूठा संबध रहा है | देवभूमि उत्तराखण्ड के गांवों व पर्वतिय अंचलों में आज भी वैदिक संस्कृति विद्यमान हैं, उसी के अनुरूप यहां पूर्व से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहरों के प्रतिक पर्वो को आज भी बड़े श्रद्धाभाव आस्था से मनाया जाता है | हरेला पर्व द्वारा कृषि की सम्पन्नता की कामना की जाती है , जिससे गांव देश धन धान्य से परिपूर्ण हो | हरेला पर्व हरियाली का प्रतिक व प्रकृति से संबधित होने के साथ साथ जीवन में आशा का संचार करते हैं |