आधी दुनिया का आधा-अधूरा सच

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सूचना माध्यमों में स्त्री ?अस्मिता से जुड़े तमाम मुद्दों पर गंभीर विमर्श नजर आता है। सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता व तौर-तरीकों को नजरअंदाज कर दें तो भी कोई स्पष्ट तस्वीर नजर नहीं आती। नि:संदेह महिलाओं की हैसियत में आजादी के बाद व्यापक बदलाव आया है। तरक्की के आंकड़ों की बात करें तो सरकारी तस्वीर में उजली और स्वतंत्र आंकड़ों में धुंधली तस्वीर नजर आती है। बावजूद इसके बहुत कुछ बदला है।

किसी समाज की सभ्यता का पैमाना स्त्री के प्रति नजरिये से तय होता है कि समाज का महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार है। स्त्री की सुकोमल प्रवृत्ति और विशिष्ट जैविक गुणों को आधार मानें तो तार्किक रूप से स्त्री को पुरुष के बराबर ला पाना संभव नजर नहीं आता। मगर यहां यह जरूरी है कि उसको तरक्की के मौकों व समता के अधिकारों को पर्याप्त सम्मान मिले। उसके हक व मेहनताने से भेदभाव न हो। एक सर्वेक्षण बताता है कि भारत में महिला व पुरुषों के वेतन में बीस फीसदी का अंतर है। बीसीसीआई द्वारा हाल ही में घोषित अनुबंध पर नजर डालें तो जहां पुरुष खिलाड़ी का मेहनताना ए प्लस श्रेणी में सात करोड़ रुपये है वहीं महिला क्रिकेटरों का ए श्रेणी में महज पचास लाख।

नि:संदेह यह उदाहरण भारतीय समाज के एक काले सच को उजागर करता है। कहा जा सकता है कि पुरुष क्रिकेट का बाजार बड़ा है और आय भी। मगर यह अंतर बहुत ज्यादा है जो अन्याय का ही प्रतीक है। समाज में इसी भेदभाव की सोच को खत्म कीजिये। देश की शीर्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं में तैंतीस फीसदी महिला आरक्षण का विरोध करने वालों पर रोक कैसे लगेगी। पिछले सात दशक में महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ, मगर अपेक्षा के स्तर तक नहीं हुआ। हम गर्व कर सकते हैं कि देश में रक्षा मंत्री, फाइटर प्लेन चलाने व सीमा पर मोर्चा संभालने का दायित्व आज महिलाएं निभा रही हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि 95?फीसदी पुरुष पारिवारिक मामलों में पत्नियों की राय को प्राथमिकता देते हैं। तीन-चौथाई महिलाएं परिवार के स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेती हैं। वर्ष 2006 के मुकाबले कमाऊ पत्नियों की संख्या दुगनी हुई है। कुल 53 फीसदी महिलाओं के बैंक अकाउंट हैं। 43 फीसदी कामकाजी महिलाएं पति के बराबर या अधिक कमा रही हैं। कुल 82 फीसदी कामकाजी महिलाएं अपनी मर्जी से खर्च कर रही हैं। हरियाणा में 43 फीसदी महिला सरपंच हैं। मगर काला सच यह भी है कि हर मिनट में 38 महिलाओं पर अपराध होते हैं। फिर ?भी वे अपनी राह पर निकल पड़ी हैं, पुरुषों को उनकी राह आसान करनी है।