व्यंग्य : गड्ढे में ना गिरे सरकार

ललित शौर्य

भारतीय राजनीति में गड्डों का बड़ा महत्व है। गड्ढे ना होते तो कई लोग आज विधायक, सांसद, मंत्री- संत्री ना होते। आज भी अनेक छुटभैय्या नेताओँ के परिवार और राजनीति दोनों ही गड्डो से चलती हैं। गड्ढे केवल गड्ढे नहीं खेवनहार हैं। दशकों से गड्ढे विपक्षीयों के लिए मुद्दे हैं। सत्ता आते ही उन्हें भले ही गड्ढे ना दिखते हों, पर जब-जब वो विपक्ष में होते हैं उन्हें गड्डों में शहर दिखता है। गड्ढे में देश दिखता है। सबकुछ गड्डम -गड्ढा दिखाई देता है। ऐसा नहीं की गड्ढे नहीं भरे जाते । गड्डे भरे जाते हैं। पर पुनः गड्डे होने के लिए। वैसे देखा जाए तो गड्ढे सड़क का आभूषण हैं। भला वो कैसी सड़क जिस में गड्डे ना हों। जैसे किसी सुन्दरी में नजाकत और नखरे अनिवार्य हैं उसी तरह अच्छी सड़क के लिए गड्डे होना अनिवार्य है। नेतागिरी, अफसरगिरी, प्रधानगिरी सब गड्डो के लिए है। वर्षों से सरकारें गड्डे भरने का ही यत्न कर रहीं हैं लेकिन आज तक गड्डे ना भर सकीं । गड्डे बढ़ते गए , बजट बढ़ते गए, नेतागिरी होती रही। लोग आईएएस , पी सी एस करते हैं बस गड्डे भरने के लिए। हड़ताल की जाती है, आंदोलन किये जाते हैं, अनशन किया जाता है ताकि गड्ढे भर सकें । पर गड्ढे कभी भर न सके। घोषणा पत्र में गड्डो की बात होती है। सरकार बनते ही मंत्री संत्री प्रदेश और देश को गड्डा मुक्त करने का प्रण लेते हैं। जिस तरह आजादी के इतने वर्षों बाद भी लोगों के घाव नहीं भरे, पीड़ा बढ़ी है उसी तरह सड़कों के साथ-साथ गड्ढे बढ़े हैं।

extraगड्ढे तब बड़भागी हो जाते हैं जब कोई बड़ा मंत्री,  नेता ,सीएम या पीएम का दौरा उसकी सड़क से होकर गुजरता है। तब गड्डो की बड़ी पूछ होती है। सड़कों पर गड्डे पाटे जाते हैं। सड़कों पर गड्डे ढूंढे जाते हैं। गड्डों का कोई परमानेंट इलाज नहीं होता। उन्हें बस मिट्टी से ढाका जाता हैं। हल्का पानी मारा जाता है। ये व्यवस्था केवल नेताओं के कारवां गुजरने तक के लिए होती है। ये इसलिए भी होता है कि कहीं सरकार के नुमाइंदे गड्ढे में ना गिरें। कहीं सरकार गड्ढे में ना गिरे। इसलिए गड्डो का सर्च ऑपरेशन तेजी से चलाया जाता है। गड्डो पर सर्जिकल स्ट्राइक की जाती है। नेताजी के गुजरते ही धूल का गुबार उठता है। जनता का मुंह धूल से सन जाता है। चारो तरफ धूल ही धूल। अरमानों पर धूल, सपनों पर धूल, विचारों पर धूल, आकांक्षाओं में धूल । बस धूल ही धूल।गड्डे फिर से गड्डे बन जातें। मुद्दे बन जाते हैं। सरकार गड्डे निकल कर राजधानी पहुंच जाती है।