एक नया खलनायक

पता नहीं इस रिपोर्ट के बाद भी हम प्रदूषण को अपने सामने मौजूद सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल करेंगे या नहीं। चिकित्साशास्त्र की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका लैंसेट मेडिकल जर्नल द्वारा गुरुवार को जारी एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से पूरी दुनिया में 90 लाख लोग मारे गए, जिनमें 25 लाख भारत के थे। मृतकों के ये आंकड़े एड्स, मलेरिया और टीबी जैसी घातक बीमारियों से मरने वालों से तीन गुना ज्यादा हैं।

रिपोर्ट में दूसरे नंबर पर चीन है, जहां 18 लाख लोग प्रदूषण की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे। भारत को लेकर पिछले कुछ समय से खतरनाक आंकड़े आ रहे हैं। कई भारतीय एजेंसियों की जांच में भी पाया गया कि हमारे कई शहरों में वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुंच चुका है, लेकिन भारत में सरकार और जनता, दोनों के लिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया है। हम आज भी इसे पश्चिम के बौद्धिक चोंचले के रूप में देखते हैं, या फैशन जैसा कुछ मानते हैं। भारत के सारे राजनेता यह मानकर चलते हैं कि रोजी-रोजगार ज्यादा अहम है। इसकी कीमत पर पर्यावरण सुरक्षा को बढ़ावा कैसे दिया जा सकता है? जनता की राय भी इससे अलग नहीं है। ताजा उदाहरण दिवाली का है। दिल्ली-एनसीआर में खतरनाक स्तर तक पहुंचे वायु प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी। इसके बावजूद दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद में लोगों ने पहले की तरह ही पटाखे फोड़े।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का मानना है कि इस साल दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर पिछले साल से कम रहा, फिर भी यह खतरनाक स्तर पर है। पिछले कुछ समय से पर्यावरण को लेकर जो थोड़ी बहुत सतर्कता बरती जा रही है, उसका सारा श्रेय न्यायपालिका की सख्ती को जाता है। सरकार इस मामले में बेहद लापरवाह है। हमारे यहां पुराने वाहनों को हटाने में प्रशासन हिचकता है। पलूशन कंट्रोल के नाम पर बनाए गए दफ्तरों में आपको शिकायत दर्ज करने वाले बाबू तक नहीं दिखते।

फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ कदम उठाने में हमारी सरकारों के हाथ-पैर फूल जाते हैं। नए उद्योग लगाने वालों को आश्वासन दिया जाता है कि पलूशन को उनके प्रॉजेक्ट के आड़े आने नहीं दिया जाएगा। नदियों की सफाई पर अरबों बहाने के बावजूद उनकी गंदगी का कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि उनमें डाले जाने वाले कचरे के निस्तारण का कोई सिस्टम सरकार नहीं बना पाई है। शहरों का कूड़ा कहां डाला जाएगा, यह शहरों की योजना में ही शामिल नहीं है। लेकिन आज जब प्रदूषण का मामला जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है, हमें नींद से जागना होगा। सरकार भी अपनी मर्जी से नहीं, हमारे दबाव में ही इसे अपने अजेंडे पर लाएगी।