व्यंग्य : जुगाड़ चल रहा है…

ललित शौर्य

Lalit Mohan Rathorकभी बचपन में रटा करते थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है.परन्तु आज जब हम पर समझदारी की अद्रश्य मुहर लग चुकी है तब समझ आता है कि वो सब झूठ था. देश कृषि प्रधान नहीं बल्कि नकल और जुगाड़ प्रधान है. क्योंकि यहाँ चारों ओर बहुतायत में जुगाड़ और नकलची ही पाये जाते हैं. अब नकल और जुगाड़ देश की शिराओं में दौड़ने लगा है. इसके बिना भोले भी भला नहीं कर सकते. नकल और जुगाड़ प्रवार्त्ति हम लोगों में बचपन से ही ठूंसी चली आ रही है.छोटी से लेकर बड़ी कक्षाओं तक बन्दा पढाई कम, पास होने का जुगाड़ ज्यादा तलाश करता है. बोर्ड परीक्षाओं में सारा दिन और सारी रातें पर्चियां लिखने में ही निकल जाती हैं. कई बार तो केंद्र व्यवस्थापक और अध्यापकों से भी सेटिंग हो जाती है. जुगाड़ महिमा अनंत है.

सामान्य रूप से जो काम एवरेस्ट चढ़ने जैसा लगता है वही काम जुगाड़ से चुटकी में हो जाता है. नकल के सम्बन्ध में हमें अपने आप को कतई नहीं कोसना चाहिए. बल्कि हमें गर्व होना चाहिए की हम नकलची हैं एवं एक सम्रध्द परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं. बचपन में हमें एक बात और घुटाई गई थी कि हमारे पूर्वज बन्दर थे. और हम सब जानते हैं की बन्दर से महान नकलची और जुगाडू मिल पाना संभव नहीं है. अतः हम मनुष्य स्वाभाव और जन्म से ही जुगाडू और नकलची हो गए हैं. खासकर हम भारतीयों में ये महागुण अन्दर तक घुसा हुवा है. हमने नकल और देखा देखि में अपनी संस्कृति , संस्कार और स्वाभिमान को जो पलीता लगया है वैसा अन्य किसी देश के नागरिक नहीं कर सकते हैं. जुगाड़ से बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठा जा सकता है. फिर उस कुर्सी पर से अयोग्य निर्णय देकर देश को डुबोया जा सकता है.

जुगाड़ शक्ति के सम्मुख आपका कठोर परिश्रम भी फुस्स है. जबतक आपके पास जुगाड़ रुपी चाबी नहीं आपका यान तिल भर भी नहीं खिसक सकता. घर से बाहर , देश –प्रदेश सब जगह जुगाड़ महिमा फैली हुई है. घर में गृहणी को प्रसन्न करने के लिए दसों जुगाड़ करने होते हैं. कभी सोने का हार तो कभी महंगी साड़ी दिलवानी होती है. हम सभी को जुगाडू बनने की ओर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. अगर हम जुगाडू बन गए तो बड़ा आदमी तो बन ही जायेंगे.नकल हमारी रग में और जुगाड़ दिमाग में चढ़ गया है. इन दोनों के बिना जीना भी क्या जीना है लल्लू. आजकल समाज में एक गलत अफवाह चल रही है, किसी से भी पूछो की भाई साहब, “क्या चल रहा है?” बंदा पलटते ही जवाब देता है , “फ़ोग चल रहा है” . वास्तव में फ़ोग – वोग कुछ नहीं चल रहा , ये असल मुद्दे से ध्यान हटाने का एक षड्यंत्र है. भारत में सदियों से जुगाड़ चलता आया है, और जुगाड़ ही चलता रहेगा. ये दो वरदान हैं. इनका फायदा लेते रहिये, जुगाड़ भिड़ाते रहिये. सफलता कदम चूमेंगी.