गुरिल्ला फिर गुर्राये

वर्ष 1962 में हुये चीन युद्ध में भारत को करारी हाल तो मिली ही, साथ ही 45 हजार वर्ग किमी. भूमि गवांनी पड़ी थी। भारत सरकार इससे चेती, सरकार ने देश के सीमावर्ती लोगों को एसएसबी प्रशिक्षण दिलाया। वर्ष 1965 युद्ध से पहले इन प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की वजह से पहले ही खबर लब चुकी थी कि दुश्मन आ रह है, उसकी तैयारी क्या है? कहां-कहां हमले करेगा? उस युद्ध में भारत ने विजय प्राप्त की। स्वंयसेवक गुरिल्ला तब से सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत के प्रति समपिग्त रहते हुये सक्रिय रहे हैं। आज वे और उनका परिवार फटेहाल है। वे सरकार से नौकरी की मांग करते आ रहे हैं? आइये डालते हैं गुरिल्लाओं के आन्दोलन पर एक नजर-सम्पादक


gurillaaचन्द्र शेखर भट्ट

देहरादून। बीती 27 अक्टूबर को यहां गुरिल्लाओं का दो दिवसीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ। अधिवेशन में कई निर्णय लिए गये। इसके बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री आवका घेराव किया गया। यहां आयोजित सभा में गुरिल्ला खूब गुर्राये। सभा के संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रहृमानंद डालाकोटी ने भी सम्बोधित किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि- वर्ष 1962 का युद्ध समाप्त होने के बाद केन्द्र सरकार ने सीमा की सुरक्षा के लिए सेना के अतिरिक्त आम नागरिकों को भी सैनिक प्रशिक्षण तथा उन्हीं के बीच में से कुछ लोगों को छापामार युद्ध का गहन प्रशिक्षण देने की आवश्यकता महसूस की गयी। ताकि किसी भी संभवित चीनी आक्रमण का मुकाबला दृढ़ता से किया जा सके। इस प्रकार छापामार युद्ध में प्रशिक्षित लोगों को ही एसएसबी स्वयं सेवक कहा जाता है।

जिनके लिए तब सामान्य शान्तिकाल में आम जनता में, सास्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक चेतना जगाने, श्रमदान एवं सरकारी आर्थिक सहायता से खेल के मैंदान, जल श्रोत-सवंर्धन छोटी पेयजल योजनाओं का निर्माण स्वास्थय संम्बन्धी सेवाएं देने के साथ-साथ क्षेत्र के विकास कार्यो एवं अन्य गतिविधयों की सूचना  एसएसबी के क्षेत्रीय कार्यालयों को देने का काम होना होता था वहीं युद्ध काल में सेनाओं की सहायता करने उन्हें रशद पहंुचाने उन्हें दुश्मन के क्षेत्र की जानकारी देने दुश्मन गतिविधियों पर चरवाहें, लकड़ी बीनने, घास काटने वालो के रूप में छुपकर निगरानी रखने तथा युद्ध के बाद किसी अपरिहार्य स्थिति में कोई क्षेत्र दुश्मन के कब्जें में चला जाता है। तो उस क्षेत्र के नागरिकों को साथ लेकर उनका नेतृत्व करते हुए दुश्मन सेनाओं के खिलाफ छापामार युद्ध कर दुश्मन देश की सेनाओं को अपने क्षेत्र से बाहर खदेड़ने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी थी। 1963 से लेकर 2003 तक एसएसबी स्वयं सेवकों द्वारा अपने शांतिकाल की सभी गतिविधियों बखूबी अजांम दिया तथा पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में जहां राष्ट्रविरोधी गतविधियों संचालित होती थी उन क्षेत्रों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की यही नही 1963 के बाद हुये पाकिस्तान के साथ हुये युद्धों में भी एसएसबी स्वयं सेवकों ने अपने क्षेत्रीय ज्ञान एवं गोपनीय जानकारियों से सेना एवं गोपनीय संस्थाओं की सहायता की। कालान्तर में चीन द्वारा किसी बड़े आंक्रमण की संभावना न होने के कारण 2003 में एसएसबी की भूमिका में परिवर्तन करते हुये एसएसबी स्वयं सेवकों की भूमिका को समाप्त करते हुये उन्हें दूध में मक्खी की भांती फेक दिया गया किन्तु मणिपुर के एसएसबी स्वयं सेवकों के न्यासिक एवं राजनैतिक दबाव के कारण जब 1 जनवरी 2004 को 799 एसएसबी स्वयं सेवकों को नौकरी एवं पैंशन दे दी गई अन्य राज्यों में भी नौकरी पैंशन की मांग उठने लगी।

अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ जनपद में 2006 में बैठकों प्रदर्शनों, ज्ञापनों का दौर शुरू हुआ। यहीं नहीं 6 जून 2006 को तत्कालीन संयुक्त सचिव गृह जे.एस. गौड से गुरिल्लों की वार्ता भीमताल के होलिडे इन होटल में हुई उस मुलाकात के बाद सितम्बर 2006 तत्कालीन महानिदेशक एसएसबी ने 5000 गुरिल्लों की वार्ता तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटील से हुइ्र फिर भी जब कार्यवाही आगे नही बढी तो राज्य स्तर पर संगठित रूप से आन्दोलन चलाते हुए जिला स्तरों पर धरने-प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ। जिस क्रम में राज्य की राजधानी देहरादून में अनेक धरने तथा प्रदर्शन किये गये।

राज्य के दोनों मंडलों में अनेक प्रदर्शन के बाद 23 जुलाई 2009 को नई दिल्ली जन्तर-मन्तर में प्रदर्शन किया गया तथा उसी दिन से जन्तर-मन्तर में अनिश्चित कालीन धरना भी शुरू कर दिया गया। इसी क्रम में 26 अक्टूबर 2009 से राज्य के विभिन्न जनपद मुख्यालयों में धरने प्रारम्भ किये गये जिनमें से अल्मोड़ा तथा बागेश्वर मुख्यालयों में धरने आज भी बदस्तूर जारी है। इस क्रम मे दिल्ली में धरने के दौरान 24 सितम्बर 2009 को तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री, हरीश रावत, सांसद विजय, बहुगुणा सांसद, भगत सिंह कोश्यारी जी के साथ गुरिल्लों ने मुलाकात की इस बैठक में एसएसबी स्वयं सेवकों के लिए कोई योजना बनाये जाने पर सहमति बनी। 23 मार्च 2010 तथा 10 नवम्बर 2010 को देहरादून हुए विशाल प्रदर्शनों के दौरान हुए लाठी चार्ज में न केवल सैकड़ों गुरिल्लों धायल हुये बल्कि अनेक गुरिल्लों पर मुकदमें भी दर्ज किए गये। इसी दौरान 15 मार्च 2010 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर भी संगठन का विस्तार किय गया जिसमें हिमालय-जम्मू कश्मीर सहित पूर्वोत्तर के अनेक राज्य आंदोलन में शामिल हो गये।

5 सितम्बर 2011 को राज्य स्तर पर मामले के निस्तारण हेतु मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई जिसमें गुरिल्लों को विभिन्न विभागों में समायोजन का भी निर्णय लिया गया समायोजन न होने पर 9 दिसम्बर 2011 को नई दिल्ली में विशाल प्रदर्शन किय गया वहीं 12 दिसम्बरर से विधानर सभा के सामने सैंकड़ों गुरिल्लों द्वारा एक साथ आमरण अनशन शुरू करदिया इसी दौरान 19 दिसम्बर को पुनः मुख्य सचिव उत्तराखंड शासन की अध्यक्षता में पुनः बैठक हुई 2012 में विधान सभा चुनाव के कारण कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पायी।

2012 में नई सरकार के गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तथा वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत जी से गुरिल्लों की अनेकों मुलाकाते हो चुकी है तथा स्तर पर गुरिल्लों को इको टास्क फोर्स बनाकर समायोजित करने, स्वैच्छिक आपदा प्रबन्धन बल में भर्ती करने, राज्य पुलिस होम गार्ड में भर्ती करने, लोक निर्माण विभाग में मेट एवं बेलदार पदों पर नियुक्ति दिये जाने की घोषणाएं की गयी किन्तु राज्य की नौकरशाही उक्त शासनादेशों घोषणाओं में भांति-भांति के अडं़गे लगाकर उन्हें क्रियान्वित नहीं कर रही है। आज हम सरकार से अपनी ही घोषणाओं के वास्तविक क्रियान्वयन की मांग कर रहे है। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार द्वारा वास्तवित एसएसबी स्वयं सेवकों की सत्यापन के बाद नौकरी  एवं पैंशन पर कार्यवाही की मांग की जा रही है तथा राज्य सरकार से इस संम्बध में सुसंगत प्रस्ताव विधान सभा से पारित कर केन्द्र सरकार को भेजने की भी हमारी मांग है।