बहुत कठिन है कांग्रेस की डगर

उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनाव परिणामों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सबक मान लेने के बावजूद भाजपा आलाकमान और मोदी सरकार की आक्रामकता सत्ता के अहं की परिचायक है तो कांग्रेस के तीखे तेवर भी अति आत्मविश्वास ही है। एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में सोनिया गांधी ने तो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में संप्रग की सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी ही कर दी। फिर कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी पर मुहर लगाने के लिए हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में भी पार्टी के तेवर तीखे नजर आये। नरेंद्र मोदी सरकार को हर मोर्चे पर नाकाम करार देते हुए खुद राहुल गांधी ने मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर सीधे प्रहार किये। उनके तेवरों को पराजित पार्टी के नेता का प्रलाप भी माना जा सकता है और आत्मविश्वास से लबालब विपक्ष के नेता की आक्रामकता भी।
राहुल कांग्रेस अध्यक्ष भले ही पिछले दिनों चुने गये हैं, लेकिन पहले महासचिव और फिर उपाध्यक्ष के रूप में, वर्षों से कांग्रेस के ज्यादातर बड़े फैसले वह ही लेते रहे हैं।

इन्हीं वर्षोँ में कांग्रेस ने राजनीतिक नाकामियों का नया इतिहास रचा है। आठ साल के अंतराल के बाद केंद्रीय सत्ता पर एक दशक तक काबिज रहने वाली कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों तक सिमटने की दुर्दशा में इन्हीं वर्षों में पहुंची है। इसके बावजूद कांग्रेस के इस ऐतिहासिक चुनावी पतन के लिए सिर्फ राहुल को जिम्मेदार ठहराना उनके साथ अन्याय होगा। राहुल को जो कांग्रेस विरासत में मिली है, वह उत्तरोत्तर कई तरह की विकृतियों से ग्रस्त होती गयी है। 28 दिसंबर, 1885 को जिस पार्टी का गठन विदेशी सत्ता से देश की आजादी के लिए किया गया था, वह आजादी के बाद तेजी से सत्ता पाने और फिर उसे बनाये रखने का औजार मात्र बन गयी। चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलती गयी, व्यवस्था नहीं बदली। चेहरे बदलते गये, चरित्र नहीं बदला। नतीजतन जन साधारण में निराशा और आक्रोश बढ़ा, जिसे भुना कर सत्ता पाने की कवायद में भारत का संसदीय लोकतंत्र दलों का दलदल भी बन गया।

कहना नहीं होगा कि इस प्रक्रिया में कांग्रेस लगातार कमजोर होती गयी। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनावों में भले ही राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए 413 सीटें जीती हों, पर सहानुभूति की लहर में हासिल उस ऐतिहासिक चुनावी सफलता को कांग्रेस की ताकत का प्रमाण मान लेना भूल होगी। यह बात साबित भी हो गयी, जब प्रचंड बहुमत से बनी राजीव गांधी की सरकार बोफोर्स आदि भ्रष्टाचार के मुद्दों पर अंदर से ही मुखर बगावत से डगमगाने लगी और अंतत: चुनाव में सत्ता से बेदखल भी हो गयी। निश्चय ही कांग्रेस उसके बाद भी सत्ता में आती रही, लेकिन वह चुनाव प्रबंधन या जुगाड़ का ही परिणाम था। इसके बावजूद अगर सोनिया और राहुल आत्मविश्वास दर्शा रहे हैं तो उसकी वजह मोदी सरकार से तेजी से हो रहा मोहभंग ही है।

तीन दशक बाद किसी एक दल को अपने बूते बहुमत दिलाने का करिश्मा करने के बावजूद मोदी ने नोटबंदी, जीएसटी और एफडीआई को खुली छूट के बाद तेजी से अपनी लोकप्रियता गंवायी है। भ्रष्टाचार, महंगाई, आतंकवाद, अपराध, बेरोजगारी के मोर्चे पर भी सरकार का प्रदर्शन पूर्ववर्तियों से बेहतर तो हरगिज नहीं। इसका भी परिणाम है कि वर्ष 2014 में चौंकाने वाली चुनावी सफलता हासिल करने वाली भाजपा उपचुनावों में लगातार मात खा रही है। उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनावों में मिली मात को भाजपा भले ही सपा-बसपा गठबंधन का नतीजा बता दे, लेकिन बिहार और उससे पहले पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश के उपचुनाव नतीजों को कैसे नजरअंदाज करेगी?

पस्तहाल कांग्रेस में अचानक जागे आत्मविश्वास की वजह भी यही उपचुनाव नतीजे हैं, पर क्या यह सही मायने में अति आत्मविश्वास नहीं है? दो दलीय राजनीति वाले राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो भाजपा की हार का सीधा लाभ कांग्रेस को मिल सकता है, लेकिन अन्य राज्यों में कांग्रेस है कहां? अररिया की जीत लालू यादव की जीत है तो गोरखपुर-फूलपुर की जीत बसपा के समर्थन से मिली सपा की जीत है। सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार उतार कर कांग्रेस ने राजनीतिक अपरिपक्वता की परिचय दिया।

पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मोदी लहर को अपवाद मान लें तो उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ही जमीनी राजनीतिक दल हैं। अगर निजी रंजिश की हद तक विरोध के बावजूद बसपा, भाजपा को हराने के लिए सपा उम्मीदवारों का बिना शर्त समर्थन कर सकती है तो फिर विधानसभा चुनाव सपा के साथ गठबंधन में लडऩे वाली कांग्रेस ने क्या सोच कर जमानत जब्त कराने वाले उम्मीदवार मैदान में उतारे? कांग्रेस भी सपा उम्मीदवारों का समर्थन करने का बड़प्पन दिखाती तो जीत का श्रेय ले सकती थी। भविष्य की राजनीति में सहयोग का दबाव भी सपा पर रहता। सत्ता गंवाने के बाद विनम्र हो गये अखिलेश बसपा की अहमियत समझ चुके हैं, लेकिन हाशिये पर पड़ी कांग्रेस को वह क्यों अपनी साइकिल पर हाथ रखने देंगे?

सवाल सिर्फ अखिलेश और मायावती का नहीं है। नीतीश से दगा पाये लालू की तो मजबूरी है हाथ का साथ, लेकिन दशकों तक उपेक्षित रहीं ममता बनर्जी को कांग्रेस की क्या दरकार? साथ छोड़ कर अब मोदी सरकार से दो-दो हाथ करने पर आमादा चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम के लिए भी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की क्या उपयोगिता है? पिता की मृत्यु के बाद दुत्कारे गये जगन मोहन रेड्डी भी कांग्रेस को क्यों वापस जमीन पाने देंगे? केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा के साथ सरकार में शामिल शिवसेना भी अगला लोकसभा चुनाव अकेले लडऩे का ऐलान कर चुकी है, लेकिन वह भी उस कांग्रेस के साथ कैसे जायेगी, जिसके शासन के विरुद्ध ही वह अस्तित्व में आयी? हां, शरद पवार की राकांपा और शिवसेना अवश्य करीब आ सकते हैं। यथार्थ की कठोर जमीन का अनुभव ले चुके राज ठाकरे भी सत्ता के इस खेल में भागीदार बन सकते हैं।