चक्का जाम के सवाल

जनहित में बने पारदर्शी परिवहन नीति

roaways-hariyanaहरियाणा में रोडवेज बसों का चक्का एक बार फिर जाम है। मनोहर लाल खट्टर सरकार जो भी दावे करे, जमीनी सच्चाई यह है कि हड़ताल के दूसरे दिन मंगलवार को रोडवेज की कुल 4060 बसों में से लगभग 3700 बसें नहीं चलीं। हालांकि सरकार ने हड़ताली कर्मचारियों के निलंबन की कार्रवाई शुरू कर दी है, लेकिन दोनों पक्षों की हठधर्मिता से चक्का जाम लंबा खिंचने की ही आशंका गहरा रही है। हरियाणा रोडवेज के कर्मचारी बड़ी संख्या में निजी बसों को परमिट दिये जाने के विरोध में हड़ताल पर हैं, लेकिन सरकार मौजूदा नीति के आधार पर ये परमिट जारी करना अपना अधिकार बता रही है।

बेशक नीतिगत फैसले लेना सरकार का अधिकार है, लेकिन ऐसा करते समय सभी संबंधित पक्षों को विश्वास में लेने और पारदर्शिता बरतने से परहेज क्यों होना चाहिए? नहीं भूलना चाहिए कि पूर्ववर्ती भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उससे पहले ओमप्रकाश चौटाला सरकारों को भी रोडवेज कर्मियों के विरोध के चलते ही निजी रूट परमिट नीति पर कदम वापस खींचने पड़े थे। ऐसे में यह सवाल अनुत्तरित है कि मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अतीत से कोई सबक क्यों नहीं सीखा? दरअसल खट्टर सरकार द्वारा जारी निजी रूट परमिटों के जो आंकड़े आ रहे हैं, वे तो मामले को और भी संदेहास्पद बनाने वाले हैं। क्या इन परमिटों के जरिये अपनों को रेवडिय़ां बांटने का परंपरागत खेल ही नहीं खेला जा रहा?

खट्टर सरकार ने बड़ी संख्या में निजी रूट परमिट जारी करने से पहले रोडवेज कर्मचारी यूनियन से बात करना जरूरी नहीं समझा। चक्का जाम के अल्टीमेटम के बाद भी वह ऐन वक्त हरकत में आयी। सोमवार से चक्का जाम की धमकी थी और सरकार ने उसी दिन रोडवेज यूनियन को वार्ता के लिए बुलाया। पहले दो दिन में तीन दौर की वार्ता विफल होने से साफ है कि दोनों ही पक्ष अपने-अपने रुख पर अडिग हैं।

जाहिर है, किसी भी पक्ष के रुख को पूरी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए दोनों ही पक्षों को व्यापक राज्यहित और जनहित में व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए जल्द से जल्द इस गतिरोध को समाप्त करना चाहिए। नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा रोडवेज से रोज लगभग 12 लाख यात्री सफर करते हैं, जिससे सरकार को लगभग चार करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है।

चालक-परिचालकों के खराब व्यवहार के अलावा देखें तो हरियाणा रोडवेज सेवा की साख संतोषजनक ही रही है। लंबे समय तक यह मुनाफे में भी रही है। ऐसे में रोडवेज की कीमत पर निजी बस व्यवस्था को बढ़ावा देने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसी तरह रोडवेज कर्मियों को भी समझना होगा कि जिन रूटों पर रोडवेज सेवा नहीं है, वहां आम यात्रियों की सुविधा के लिए निजी बस बेहतर विकल्प हो सकती है, लेकिन यह काम पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।