घोटालों के बैंक

मिलीभगत से जारी जन धन की लूट

देश के अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंकों में शुमार पंजाब नेशनल बैंक में देश के सबसे बड़े बैंक घोटाले से जनमानस स्तब्ध है। मुंबई स्थित बैंक की एक ही ब्रांच में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से साढ़े ग्यारह हजार करोड़ का घोटाला हो जाये और निगरानी करने वाली संस्थाओं व बैंक के शीर्ष प्रबंधन को कानोकान खबर न लगे, ऐसा कैसे संभव है? इस खुलासे से एक बात तो तय है कि अभी भी बड़े बैंक गैर-पेशेवराना ढंग से सुरक्षा के चाक चौबंद प्रबंधन के बिना ही काम कर रहे हैं।

पंजाब नेशनल बैंक में पहले भी ऐसे घोटाले सामने आये हैं। वर्ष 2013 से 2017 के पांच वित्तीय वर्षों में अन्य बैंकों के घोटालों के मुकाबले यह राशि तकरीबन नौ हजार करोड़ के करीब रही है। वहीं स्टेट बैंक में यह राशि छह हजार करोड़ से अधिक रही है। पिछले कुछ समय में केंद्र सरकार की नीतियों के चलते बैंकों ने बड़ी पूंजी हासिल की है, मगर यह राशि आम खाताधारकों की मेहनत की कमाई का हिस्सा है। आये दिन होने वाले घोटालों से जनता का बैंकिंग व्यवस्था से ही विश्वास उठने लगा है। कभी हर्षद मेहता, कभी विजय माल्या और अब अरबपति हीरा व्यापारी नीरव मोदी आर्थिक घोटालों के केंद्र में हैं।

दरअसल, यह मामला कुछ कंपनियों को दिये गये एडवांस का है। ज्यादा एनपीए इस एडवांस की देन रहे हैं। यह भी हकीकत है कि 83 फीसदी घोटाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में होते हैं और 87 फीसदी एडवांस से संबंधित घोटाले इन बैंकों में होते हैं। आम आदमी को यह सवाल मथ रहा है कि लोन चुकता न करने पर किसान का ट्रैक्टर, आम आदमी की कार तक अपमानजनक ढंग से ले जाने वाले बैंक अधिकारी बड़े पूंजीपतियों के खिलाफ इतने उदार क्यों हो जाते हैं?

पिछले दिनों एक बुजुर्ग की वृद्धावस्था पेंशन की राशि से कृषि ऋण वसूली बैंक द्वारा करने की खबर थी। यानी स्वतंत्र देश में बैंकिंग का चेहरा कितना अमानवीय है। खाते में कम राशि होने पर जुर्माना वसूलने वाले बैंक आखिर भ्रष्ट व्यवसायियों पर इतना मेहरबान क्यों हो जाते हैं कि बैंकों से ठगी करने के बाद विदेश भाग जाने पर बैंकों को खबर लगती है? क्या इस सारे घटनाक्रम में राजनेताओं की भी हिस्सेदारी होती है?

इस मामले में दस बैंक कर्मियों को निलंबित किया गया है। एक पूर्व बैंक अधिकारी भी इसमें लिप्त बताया जाता है। मगर सवाल यह है कि जनता की गाढ़ी कमाई को मोटे असामी कब तक डकारते रहेंगे? कब तक एनपीए घाटा बढ़ता जायेगा? सवाल यह भी है कि क्या बिना जांच-पड़ताल के बड़े ऋण देने वाले बैंक अधिकारियों को कड़ी सजा मिली है?